Our beloved Buddha
Ikkyu Tzu

“ढाई हज़ार वर्ष प्राचीन सती योग विधि की ठंडी पड़ चुकी राख में पुनः प्राण फूँक कर पुनर्जीवित करने वाले इक्क्यु एक चेतनाकर्मी हैं जो पीछे के कुछेक वर्षों से मनुष्यों की धारणाओं को तरह-तरह के औज़ारों से तोड़ते हुए चेतना को आंदोलित करने के उपक्रम में रत हैं। वर्ष २०१८ से निरंतर ही जिज्ञासुओं व मुमुक्षुओं के मध्य सती योग के विविध शिविर व सेमिनार आयोजित करते हैं।”

What is Satiyoga

हवाई जहाज को बैलगाड़ी बना लेना सती योग है। आपका मन अभी हवाई जहाज है, बहुत गति में है, उसको साँसों के बैल से बाँध कर जोत दीजिए। यही सतीयोग है।

  • जैसे कमल कीचड़ की खिलावट है, वैसे ही करुणा क्रोध की, और प्रेम घृणा की। अगर कीचड़ का रेचन कर दिया जाए, तो क्या कमल खिल सकता है?
  • अपने को बचाना धर्म है।
  • जो निकृष्टतम है वही श्रेष्ठतम को सींचता है। कीचड़ से अलग होकर कमल घड़ी भर में मुरझा जाता है।

जो मन दुखों से छुटकारा पाना चाहता है, वह यह नहीं समझता है कि जो है, उसके अतिरिक्त कुछ और चाहने की वजह से ही तो वह दुखी हुआ है। दुख भी है, इसीलिए उससे छुटकारा पाने की ‘चाह’ भी और दुख लेकर आएगा। चाह मात्र से दुख मिलता है, इस में दुख से छूटने की चाह भी शामिल है। इसी दुनिया में कोई ऐसी विधि, ध्यान, योग और उपाय नहीं है, जिससे आप उससे मुक्त हो सकते हैं ‘जो है’। जो भी आपसे यह कहते हैं कि इस विधि से, इस ध्यान से, इस थेरेपी से, इस हीलिंग से, इस पास्ट लाइफ रिग्रेशन से, इस हिप्नोसिस से, या इस तंत्र-मंत्र से आप अपने दुखों, चिंता, तनाव, अवसाद, या भय से मुक्त हो जाएँगे, वे सिर्फ़ आपके लोभ का शोषण कर रहे हैं। आपको सिर्फ़ बहला रहे हैं। आपकी मूढ़ता का फ़ायदा उठा रहे हैं। हालाँकि वे ख़ुद भी मूढ़ ही हैं। सब सुख और दुख मन के खेल हैं, जब तक मन और शरीर को ही हम अपना होना जानते हैं, तब तक यह खेल चलता ही रहेगा।

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Experience ofSeekers

I am out of words in all the languages. Whatever I try to write, the degree or intensity is not the same as the experience. Baba's energy was amazing. I remember during zikr not closing my eyes and looking at him because watching someone having so tremendous energy was a sight to behold in itself. He was a rockstar at that moment. The devil himself was dancing and jumping and provoking us. And at the same time so calm, comforting and warm. The way these 7 days we lived, is how we should live our everyday life. It was as if everything to do has been done, no more rush, nothing more to do, that fills with content. As if everything is enough.

Bodhisattva Vachaspati

प्रणाम भगवान 7 दिनों का शिविर ख़त्म चुका है, पहाड़ से लौट कर घर आ चुका हूँ, लेकिन अभी भी ऐसा लग रहा है जैसे शिविर में ही हूँ। जैसे ही थोड़ा ख़ाली होता हूँ आपकी आवाज सुनाई देने लगती है, ऐसा लग रहा है जैसे आप मेरे पास ही हैं, मैं आपके पास ही बैठा हूँ। घर पर होकर भी, यहाँ का नहीं हूँ। जीवन को जीने का रास्ता मुझे परम पूज्य दादा जी के पास से मिला था, लेकिन सही जीवन को जानने का मार्ग सिर्फ आपके पास आकर पता चला। भगवान, आप से मिलकर ऐसा लग रहा है कि अब मैं, जैसा जीवन पहले जी रहा था, वैसा नहीं जी सकता हूँ। पुराना सब कुछ हाथ से छूटता जा रहा है। अभी तक जिस जीवन-नाव में बैठा था, उस नाव को चलाने वाला कोई नहीं था। आप ही पतवार मार रहा था और कहीं-से-कहीं भटक रहा था। पहली बार ऐसा लग रहा है जैसे नाख़ुदा मिल गया हो, जीवन को एक सही दिशा मिल गई हो। अब मंज़िल की मुझे कोई चिंता नहीं है, यात्रा में इतना आनंद है कि मंज़िल की तमन्ना कौन करे! शिविर से पहले मैं कभी जीवन में एक दिन भी मौन नहीं रहा था, मौन रहना मुझे बहुत ही कठिन लगता था। लेकिन, आपके पास कैसे इतने दिनों तक मौन रह पाया मेरे लिए हैरानी की बात है। अभी भी मैं ज़्यादा नहीं बोल पाता हूँ, चुप रहना सहज लगता है, बोलता हूँ तो लगता है अपने से दूर जा रहा हूँ। ऐसा लगता है जैसे अभी तक जिसे मैं जीवन मानकर जी रहा था, वह जीवन था ही नहीं, प्रतीत होता जैसे पहली बार नींद से जागा हूँ। शिविर के दिनों को मैं कभी भूल नहीं सकता, उन सात दिन में जो भी देखा, जाना, अनुभव किया और आपसे सुना सब मेरे आत्मा पर अंकित हो गया है। पंछियों की चहचहाट, भौंरों का गुंजन, बादलों का घिरना, शाम होते ही झींगुरों का ब्रह्म नाद, और रात होते ही तारों की टिमटिमाहट, कितना कुछ है याद करने को… ऐसा लगता था मानो स्वर्ग में आ गया हूँ। शिविर शुरू होने से पहले सोच रहा था कि सात दिन बिना फ़ोन के कैसे रहूँगा, शिविर के बाद यह आलम था कि फ़ोन को छूने का भी मन नहीं कर रहा था। सात दिन के शिविर में जो जाना और समझा और जैसा जिया, वैसा कभी न तो जाना था, न ही जिया था। जीवन को जीने की एक बहुत ही अभिनव राह और समझ मिली है आपसे भगवान। - बोधिसत्व नागसेन

भगवान Ikkyu Tzu के साथ हिमालय की गोद में बिताए सुंदरतम दिन🏔️ 🍀 Date-30/09/23 to 08/10/23🍀 यूँ तो अनुभव को शब्दों में लिखा नहीं जा सकता और शब्दों को पढ़कर उसका अनुभव नहीं कर सकते है , उसके लिए तो स्वयं ही अनुभव करना पड़ता है, फिर भी भगवान की आज्ञा है तो थोड़ा लिखने का प्रयत्न करते हैं। काफी सालों से हिमालय के सौंदर्य के बारे में सुना था, पढा था, और फ़िल्मों में देखा था. लेकिन कभी गया नहीं था, लेकिन भीतर एक ख्वाहिश थी कि हिमालय पर जाना है. कहा जाता है कि जो हम चाहते हैं वह हमें मिल जाता है और मुझे भी मिल गया , हिमालय जाने का यह अवसर. हिमालय पर हजारों सालों से सब साधना के लिए जाते रहे है क्योंकि वहां का वातावरण उसके लिए बहुत अनुकूल है, हिमाचल के रास्ते में बहुत से बौद्ध भिक्षु और पश्चिमी लोगो को जाते देख बहुत आनंदित हुआ। लेकिन रास्ते के किनारे लगी शराब और बियर की दुकानों को देखकर दुःख भी हुआ और आश्चर्य भी कि हिमालय पर शराब की क्या आवश्यकता है? क्योंकि शराब का उपयोग बेहोश होने के लिए किया जाता है और हिमालय होश में आने के लिए है, क्या शराब पश्चिमी लोगो के लिए है? या पैसों के लिए? क्या हम पैसे के लिए हिमालय तक को बेच सकते हैं? शायद, हां. इसमें क्या आश्चर्य हो सकता है। लेकिन मुझे तो भगवान इक्क्यु से प्रयोजन था। और चीजों से कुछ लेना-देना नहीं था।३० तारीख शाम ६ बजें हम वहां पहुंच गये जहां भगवान अपने संन्यासीओ के साथ सुंदर शाम का आनंद लें रहे थे , और वह द्रश्य आंखों के रास्ते से हदय तक पहुंच गया। पहले दिन तो शरीर ने वहां की ठंड के साथ बहुत संघर्ष किया लेकिन धीरे-धीरे वहां जो भी था उसे स्वीकार कर लिया। वहां जाकर यह अनुभव किया कि इस अस्तित्व में कितना सौंदर्य है जिसे हम देख सकते हैं अगर हमारे पास मोबाइल📱 ना होता,हम देख सकते उगते और अस्त होते हुए सूरज🌞को , सुबह की ओस को, हवा में नाचते फूलों🌷को , आकाश में आते जाते बादल☁️ को , अगर हमारे पास मोबाइल ना होता तो सुन सकते पंछियों की चहचहाट को , पेड़ों से गुजरती हवा के गीत को, झींगुर की सतत आती आवाज को , झरने से बहते पानी के कल-कल नाद को और शायद सुन सकते पहाड़ के मौन को भी.. अगर हमारे पास मोबाइल ना होता तो हम अपने मित्रों से मिलने जा सकते हैं , उनके साथ बैठकर चाय का आनंद लें सकते हैं, अगर............. सबसे सुंदर बात यह थी कि हमारे पास वहां मोबाइल नहीं था और व्यर्थ की बातचीत नहीं थी, यानी हमें मौन रहना था ,बोलना नहीं था, बहार से भी और भीतर से भी। और यह सबसे सुंदर बात थी क्योंकि अगर हमारे पास मोबाइल होता तो हम हिमालय,पेड़, फूल और झरने का सौंदर्य देखने के बजाय उसकी फोटो लेने लगते और उसे देखने से चूक जाते। लेकिन हमने इन ८ दिनों में हिमालय के सौंदर्य को, संघ के मौन को और भगवान के प्रेम को हदय भरकर पिया। शांत खड़ा हिमालय भीतर भी कुछ शांत कर देता था,कभी आकाश साफ होता, कभी ओंस गिरती तो कभी बारिश भी हो जाती,तो पूरे दिन धूप छांव का खेल चलता रहता था। अस्तित्व अलग अलग ढंग से हमारा मनोरंजन करता रहता था। वैसे ही भीतर भी कभी शांति, आनंद व मौन का भी खेल चलता रहता था। उस गहन सन्नाटे में भगवान की आवाज कानों से गुजर कर हदय तक पहुंच जाती थी और एक गहन तृप्ति से हदय भर जाता था। जब वह टोपी पहनते तो भगवान ओशो की झलक मिलती और साफा बांधे तो गुरु नानक की और श्वेत वस्त्रों में वह बिल्कुल सूफी ही लगते थे। यहां मैंने सीखा जूते पहनने का तरीका, खाना खाने का सही ढंग, चाय के साथ पूरे अस्तित्व को पीना, बुद्ध की तरह चलना,उठना,बैठना, प्रकृति को देकने का ढंग..जीवन जी ने की कला। सच कहूं तो मेरे जीवन के अभी तक के यही दिन थे जिसको मैंने जीया है... अस्तित्व के मेरे उपर किए इस प्रेम और यह सुंदरतम दिनों के लिए मैं हमेशा कृतज्ञ रहूँगा।। अंत में भगवान इक्क्यु के चरणों में प्रणाम 🙏। -बोधिसत्व उपालि.

Bodhisattva Upali

Experience of Living with Beloved Bhagwan प्रणाम भगवान, शब्दों को व्यवस्थित करना बिलकुल नहीं आता पर एक लाइन में लिखना हो तो बस इतनी तमन्ना है या प्रार्थना है कि जैसे ये शिविर के 7 दिन थे वैसा ही पूरा जीवन हो सके। शिविर में आना मुश्किल हो रहा था। आपसे से ही कृष्णमूर्ति का वह वचन सुना था “अगर मुझे पता हो कि बुद्ध दुनिया के उस कोने में बोल रहे हैं, तो मुझे दुनिया की कोई ताक़त उन तक पहुँचने से रोक नहीं सकती है।” ये statement घूम रहा था मन में, रो भी रही थी और प्रार्थना कर रही थी कि पहुंच सकूँ। और आखिर तक एक unknown भरोसा भी था कि कुछ इंतजाम हो जाएगा। तहजीब हाफी की शायरी की भाषा में कहूं तो किसी से पूछ रही थी : “तुम्हें हुस्न पर दस्तरस है बहोत, मोहब्बत वोहब्बत बड़ा जानते हो तो फिर ये बताओ कि तुम भगवान की मुस्कान ,presence और आंखों के बारे में क्या जानते हो? ये ज्योग्राफियाँ, फ़लसफ़ा, साइकोलोजी, साइंस, रियाज़ी वगैरह ये सब जानना भी अहम है मगर उनके पास कैसे पहुंचा जाए जानते हो ?” वहा पर पहुंच रहे थे तो खयाल आया: “अब इतनी देर भी ना लगा, ये हो ना कहीं तू आ चुका हो और तेरा इंतज़ार हो जो तेरे साथ रहते हुए सोगवार हो लानत हो हम पे और बेशुमार हो” शिविर के दौरान एक ध्यान के बाद एकदम रोना आ गया था पर वो रोना कोई emotions कोई image या thought से नही आया था। पहली बार बजाए इसके, एक खालीपन से भरने की वजह से आया था। जैसे एक खालीपन से या कहे की जिसमें मन या भाव नही था. “तेरा चुप रहना मिरे ज़ेहन में क्या बैठ गया मैं जैसे टहलते उठते नाचते रोते भी बैठ गया, यूँ नहीं है कि फ़क़त मैं ही उसे चाहता हूँ जो भी उस पेड़ की छाँव में गया बैठ गया इतना मीठा था वो कभी मज़ाक - ग़ुस्से भरा लहजा मत पूछ उस ने जिस जिस को भी जाने का कहा बैठ गया बज़्म-ए-जानाँ(assembly of beloved) में नशिस्तें नहीं होतीं मख़्सूस जो भी इक बार जहाँ बैठ गया बैठ गया” इस बार शिविर में पहले दिन आपने कहा कि मैं चाहता हूं कि पुरुषों के बजाय स्त्रियों के प्रश्न आए। तो, मैने अपने मन में चल रहे या उठ रहे प्रश्न लिखे डायरी में लेकिन उसी वक्त नहीं पूछा, दूसरे दिन पूछूंगी ऐसा सोचा, मगर दूसरे दिन लगा कि ये क्या पूछना। लेकिन हमेशा की तरह बिना पूछे भी जवाब मिल गए और आखिर में हैरानी हुई कि शब्द भी आपने समझाने में वही इस्तेमाल किए जो मैं पूछना चाहती थी,ये चीजें कैसे होती है कभी समझ पाना मुश्किल है। और आखिरी दिन रात को मीटिंग में आपके पास बैठे-बैठे ऐसा feel हुआ कि जैसे दर्शन डायरी को लाइव जिया हो, और यह कितनी बड़ी बात है कि कोई AVAILABLE हैं हमारे लिए, जो हमारे तुच्छ बातों के बाद भी हमें इतने प्रेम से समझाते हैं, ये आपकी करुणा और प्रेम हमको कहीं नही मिल सकती, तो हम और जाएंगे भी कहाँ? “उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे अगर वहा कही तू होगा तो सबसे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे” जाते वक्त हम सब यही कह रहे थे काश ये काम न होता तो रुक जाते काश वो काम न होता तो रुक जाते पर साथ साथ एक अहोभाव भी था जो समय गुरु के सानिध्य में प्रकृति के बीच नाचे गए सत्संग किया मौन(चुप) रह पाए इसके लिए : “सारी नमाजे जैसे एक छत के नीचे फज्ल हो गई पहाड,जंगल प्रकृति की भी इसमें हम राय हो गई रहेगा याद मदीने से वापसी का सफ़र मैं नज़्म लिखने लगा था कि ना'त हो गई है” - Sangh Maitrayi (संघ मैत्रेयी)

Bodhisattva Sangh Maitrayi

Bodhisattva

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Bodhisattva Shunyo

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Bodhisattva Sangh Matrayi

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Bodhisattva Arundhati

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Bodhisattva Sangh Turiya

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Bodhisattva Gargi

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Bodhisattva Sangh Sachi

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Bodhisattva Sangh Apala

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Bodhisattva Madalasa

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Bodhisattva Mahadevi

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Bodhisattva Mahamaya

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Bodhisattva Katyayan

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Bodhisattva Vachaspati

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Bodhisattva Aniruddha

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Bodhisattva Rahul

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Bodhisattva Nagsen

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Bodhisattva Upali

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Bodhisattva Bodh Upasak

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Bodhisattva VimalKirti

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Bodhisattva Muktibodh

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Bodhisattva Aanand

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Bodhisattva Subhuti

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Bodhisattva Purn

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Bodhisattva Purnkashyap

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Bodhisattva Sariputta

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Bodhisattva Vasubandhu

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Bodhisattva Mahapran

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Bodhisattva Mirdad

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Bodhisattva Vatsayan

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Bodhisattva Siddharth

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Bodhisattva Bodhidharm

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BodhisattvaMahabodh

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Bodhisattva Mahakashyap

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Bodhisattva Nagarjun

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Bodhisattva Satchidanand

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BodhisattvaMahanam

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Bodhisattva Mugdalayan

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